हि

अध्याय 9 · 12 / 34

9.12

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥

मोघाशाः—विफल आशा वाले; मोघ-कर्माणः—सकाम कर्म में विफल; मोघ-ज्ञानाः—ज्ञान में विफल; विचेतसः—मोहग्रस्त; राक्षसीम्—आसुरी; आसुरीम्—नास्तिक; च—तथा; एव—निश्चय ही; प्रकृतिम्—प्रकृति का; मोहिनीम्—मोहक; श्रिताः—आश्रय लेते हुए।

जो इस प्रकार मोहग्रस्त हैं, वे आसुरी तथा नास्तिक मतों से आकर्षित होते हैं। उस मोहित अवस्था में, मुक्ति की उनकी आशाएँ, उनके सकाम कर्म तथा उनका ज्ञान-अनुशीलन—सब पराजित हो जाते हैं।

अनेक भक्त हैं जो स्वयं को कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में स्थित मानते हैं, किन्तु हृदय से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को परम सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनके लिए भक्ति का फल—भगवद्धाम वापस जाना—कभी आस्वादित नहीं होगा। इसी प्रकार, जो सकाम, पुण्यमय क्रियाओं में संलग्न हैं और जो अन्ततः इस भौतिक बन्धन से मुक्त होने की आशा करते हैं, वे भी कभी सफल नहीं होंगे, क्योंकि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का उपहास करते हैं। दूसरे शब्दों में, जो व्यक्ति श्रीकृष्ण का उपहास करते हैं, उन्हें आसुरी अथवा नास्तिक समझना चाहिए। जैसा कि भगवद्गीता के सातवें अध्याय में वर्णित है, ऐसे आसुरी दुष्ट कभी श्रीकृष्ण की शरण नहीं लेते। अतएव परम सत्य तक पहुँचने हेतु उनकी मानसिक कल्पनाएँ उन्हें इस मिथ्या निष्कर्ष पर ले जाती हैं कि सामान्य जीव तथा श्रीकृष्ण एक तथा अभिन्न हैं। ऐसे मिथ्या विश्वास के साथ, वे सोचते हैं कि किसी भी मनुष्य की देह इस समय बस भौतिक प्रकृति से आच्छादित है और कि ज्यों ही कोई इस भौतिक देह से मुक्त होता है, त्यों ही ईश्वर तथा उसमें कोई भेद नहीं रहता। श्रीकृष्ण के साथ एक होने का यह प्रयत्न मोह के कारण विफल हो जाएगा। आध्यात्मिक ज्ञान का ऐसा नास्तिक तथा आसुरी अनुशीलन सदा निष्फल रहता है। यही इस श्लोक का संकेत है। ऐसे व्यक्तियों के लिए, वेदान्त-सूत्र तथा उपनिषदों जैसे वैदिक साहित्य के ज्ञान का अनुशीलन सदा विफल रहता है।

अतः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को एक सामान्य मनुष्य मानना महान् अपराध है। जो ऐसा करते हैं, वे निश्चय ही मोहग्रस्त हैं, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के नित्य रूप को नहीं समझ सकते। बृहद्-वैष्णव मन्त्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो श्रीकृष्ण की देह को भौतिक मानता है, उसे श्रुति के समस्त अनुष्ठानों तथा क्रियाओं से बहिष्कृत किया जाना चाहिए। और यदि कोई संयोगवश उसका मुख देख ले, तो उसे संक्रमण से मुक्त होने हेतु तुरन्त गंगा में स्नान करना चाहिए। लोग श्रीकृष्ण का उपहास करते हैं, क्योंकि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से द्वेष करते हैं। उनकी नियति निश्चय ही नास्तिक तथा आसुरी जीवन की योनियों में बारम्बार जन्म लेना है। नित्य ही उनका वास्तविक ज्ञान मोह के अधीन रहेगा, और वे क्रमशः सृष्टि के सर्वाधिक अन्धकारमय क्षेत्र की ओर अधोगति करेंगे।