अध्याय 9 · 13 / 34
9.13
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
महात्मानः—महान् आत्माएँ; तु—किन्तु; माम्—मेरी; पार्थ—हे पृथापुत्र; दैवीम्—दिव्य; प्रकृतिम्—प्रकृति का; आश्रिताः—आश्रय लिए हुए; भजन्ति—सेवा करते हैं; अनन्य-मनसः—बिना मन के विचलन के; ज्ञात्वा—जानकर; भूत—सृष्टि; आदिम्—मूल; अव्ययम्—अक्षय।
हे पृथापुत्र! जो मोहग्रस्त नहीं हैं, वे महान् आत्माएँ, दिव्य प्रकृति के संरक्षण में हैं। वे पूर्णतः भक्ति में संलग्न रहते हैं, क्योंकि वे मुझे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, मूल तथा अक्षय, के रूप में जानते हैं।
इस श्लोक में महात्मा का वर्णन स्पष्ट रूप से दिया गया है। महात्मा का प्रथम लक्षण यह है कि वह पहले ही दिव्य प्रकृति में स्थित है। वह भौतिक प्रकृति के नियन्त्रण में नहीं है। और यह कैसे होता है? इसे सातवें अध्याय में समझाया गया है: जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करता है, वह तुरन्त भौतिक प्रकृति के नियन्त्रण से मुक्त हो जाता है। यही योग्यता है। ज्यों ही मनुष्य अपनी आत्मा को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति समर्पित करता है, त्यों ही वह भौतिक प्रकृति के नियन्त्रण से मुक्त हो सकता है। यही प्रारम्भिक सूत्र है। तटस्था शक्ति होने के कारण, ज्यों ही जीव भौतिक प्रकृति के नियन्त्रण से मुक्त होता है, त्यों ही वह आध्यात्मिक प्रकृति के मार्गदर्शन में रखा जाता है। आध्यात्मिक प्रकृति के मार्गदर्शन को दैवीं प्रकृतिम्, अर्थात् दिव्य प्रकृति, कहा जाता है। अतः जब मनुष्य इस प्रकार—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण लेकर—उन्नत होता है, तब वह महान् आत्मा, अर्थात् महात्मा, की अवस्था को प्राप्त करता है।
महात्मा अपना ध्यान श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी अन्य ओर नहीं भटकाता, क्योंकि वह भली-भाँति जानता है कि श्रीकृष्ण आदि परम पुरुष, समस्त कारणों के कारण, हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। ऐसा महात्मा, अर्थात् महान् आत्मा, अन्य महात्माओं, अर्थात् शुद्ध भक्तों की संगति से विकसित होता है। शुद्ध भक्त श्रीकृष्ण की अन्य विशेषताओं से, जैसे चतुर्भुज महाविष्णु से भी, आकर्षित नहीं होते। वे केवल श्रीकृष्ण के द्विभुज रूप से आकर्षित होते हैं। चूँकि वे श्रीकृष्ण की अन्य विशेषताओं से आकर्षित नहीं होते (देवताओं की तो बात ही क्या), अतः उन्हें किसी देवता अथवा मनुष्य के रूप से कोई सरोकार नहीं होता। वे कृष्णभावनामृत में केवल श्रीकृष्ण का ही ध्यान करते हैं। वे कृष्णभावनामृत में भगवान् की अविचल सेवा में सदा संलग्न रहते हैं।