हि

अध्याय 9 · 15 / 34

9.15

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥

ज्ञान-यज्ञेन—ज्ञान के अनुशीलन द्वारा; च—भी; अपि—निश्चय ही; अन्ये—अन्य लोग; यजन्तः—पूजा करते हुए; माम्—मुझको; उपासते—आराधना करते हैं; एकत्वेन—एकत्व में; पृथक्त्वेन—द्वैत में; बहुधा—विविधता में; विश्वतः-मुखम्—विराट रूप में।

अन्य लोग, जो ज्ञान के अनुशीलन में संलग्न रहते हैं, परमेश्वर की आराधना अद्वितीय के रूप में, अनेक में विविध रूप में, तथा विराट रूप में करते हैं।

यह श्लोक पूर्ववर्ती श्लोकों का सार है। भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि जो पूर्णतः कृष्णभावनामृत में स्थित हैं और श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं जानते, वे महात्मा कहलाते हैं; तथापि कुछ अन्य व्यक्ति भी हैं जो ठीक-ठीक महात्मा की स्थिति में नहीं हैं, किन्तु जो श्रीकृष्ण की भी विभिन्न रीतियों से आराधना करते हैं। उनमें से कुछ का वर्णन पहले ही आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञान के अनुशीलन में संलग्न व्यक्तियों के रूप में किया जा चुका है। किन्तु कुछ अन्य ऐसे भी हैं जो इनसे भी निम्न हैं, और इन्हें तीन भागों में विभक्त किया गया है—1) वह जो अपने को परमेश्वर के साथ अभिन्न मानकर अपनी ही आराधना करता है, 2) वह जो परमेश्वर का कोई रूप गढ़ लेता है और उसकी आराधना करता है, तथा 3) वह जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विराट रूप, अर्थात् विश्वरूप, को स्वीकार करता है और उसी की आराधना करता है। उपर्युक्त तीनों में से निम्नतम, अर्थात् वे जो स्वयं को परमेश्वर मानकर अपनी आराधना करते हैं और स्वयं को अद्वैतवादी समझते हैं, सर्वाधिक प्रबल हैं। ऐसे लोग स्वयं को परमेश्वर मान बैठते हैं, और इसी मनोवृत्ति में अपनी ही आराधना करते हैं। यह भी ईश्वर-आराधना का एक प्रकार है, क्योंकि वे यह समझ सकते हैं कि वे भौतिक शरीर नहीं, अपितु वास्तव में आध्यात्मिक आत्मा हैं; कम-से-कम ऐसा भाव प्रबल रहता है। सामान्यतः निर्विशेषवादी इसी रीति से परमेश्वर की आराधना करते हैं। द्वितीय वर्ग में देवताओं के उपासक आते हैं, जो कल्पना द्वारा किसी भी रूप को परमेश्वर का रूप मान लेते हैं। और तृतीय वर्ग में वे आते हैं जो इस भौतिक विश्व के प्रकटीकरण से परे किसी वस्तु की कल्पना नहीं कर सकते। वे विश्व को ही परम जीव या सत्ता मानते हैं और उसी की आराधना करते हैं। विश्व भी भगवान् का ही एक रूप है।