अध्याय 9 · 16 / 34
9.16
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥
अहम्—मैं; क्रतुः—अनुष्ठान; अहम्—मैं; यज्ञः—यज्ञ; स्वधा—पितरों को दी जाने वाली आहुति; अहम्—मैं; अहम्—मैं; औषधम्—रोगनाशक औषधि; मन्त्रः—दिव्य मन्त्र; अहम्—मैं; अहम्—मैं; एव—निश्चय ही; अज्यम्—पिघला हुआ घृत; अहम्—मैं; अग्निः—अग्नि; अहम्—मैं; हुतम्—आहुति।
किन्तु मैं ही अनुष्ठान हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, पितरों को अर्पित आहुति हूँ, रोगनाशक औषधि हूँ, दिव्य मन्त्र हूँ। मैं ही घृत हूँ, अग्नि हूँ और आहुति हूँ।
ज्योतिष्टोम नामक यज्ञ भी श्रीकृष्ण हैं, और वे महायज्ञ भी हैं। पितृलोक को अर्पित आहुतियाँ अथवा पितृलोक को प्रसन्न करने हेतु किया गया यज्ञ, जिसे शुद्ध घृत के रूप में एक प्रकार का औषध माना जाता है, वह भी श्रीकृष्ण हैं। इस प्रसंग में उच्चारित मन्त्र भी श्रीकृष्ण ही हैं। और यज्ञों में अर्पण हेतु दुग्ध-पदार्थों से बनी अन्य अनेक सामग्रियाँ भी श्रीकृष्ण ही हैं। अग्नि भी श्रीकृष्ण हैं, क्योंकि अग्नि पाँच भौतिक तत्त्वों में से एक है और अतएव उसे श्रीकृष्ण की पृथक् ऊर्जा कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, वेदों के कर्मकाण्ड विभाग में अनुशंसित वैदिक यज्ञ भी समग्रतः श्रीकृष्ण ही हैं। अथवा, अर्थात्, जो लोग श्रीकृष्ण की भक्ति अर्पित करने में संलग्न हैं, उनके विषय में यह समझना चाहिए कि उन्होंने वेदों में अनुशंसित समस्त यज्ञ सम्पन्न कर लिए हैं।