हि

अध्याय 9 · 17 / 34

9.17

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रम् ॐकार ऋक् साम यजुरेव च ॥ १७ ॥

पिता—पिता; अहम्—मैं; अस्य—इस; जगतः—विश्व का; माता—माता; धाता—पालक; पितामहः—पितामह; वेद्यम्—जानने योग्य; पवित्रम्—जो पवित्र करता है; ओंकारः—ओम् अक्षर; ऋक्—ऋग्वेद; साम—सामवेद; यजुः—यजुर्वेद; एव—निश्चय ही; च—और।

मैं इस विश्व का पिता, माता, आधार तथा पितामह हूँ। मैं ज्ञेय वस्तु, पवित्र करने वाला तथा ओम् अक्षर हूँ। मैं ऋक्, साम तथा यजुर्वेद भी हूँ।

समस्त चर-अचर विश्व-प्रकटीकरण श्रीकृष्ण की ऊर्जा की विभिन्न क्रियाओं द्वारा प्रकट होते हैं। भौतिक अस्तित्व में हम भिन्न-भिन्न जीवों के साथ भिन्न-भिन्न सम्बन्ध बनाते हैं, जो श्रीकृष्ण की तटस्था ऊर्जा के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं; किन्तु प्रकृति की रचना के अन्तर्गत उनमें से कुछ हमारे पिता, माता, पितामह, स्रष्टा आदि के रूप में प्रकट होते हैं, परन्तु वस्तुतः वे श्रीकृष्ण के ही अंश हैं। अतः ये जीव, जो हमारे पिता, माता आदि के रूप में प्रतीत होते हैं, श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। इस श्लोक में धाता शब्द का अर्थ स्रष्टा है। केवल हमारे पिता और माता ही श्रीकृष्ण के अंश नहीं हैं, अपितु उनके स्रष्टा, पितामही तथा पितामह आदि भी श्रीकृष्ण हैं। वास्तव में कोई भी जीव, श्रीकृष्ण का अंश होने के कारण, श्रीकृष्ण ही है। अतएव समस्त वेद केवल श्रीकृष्ण की ओर ही लक्षित हैं। वेदों के माध्यम से हम जो कुछ भी जानना चाहते हैं, वह श्रीकृष्ण को समझने की एक क्रमिक सीढ़ी मात्र है। जो विषय हमारी स्वरूपगत स्थिति को शुद्ध करने में सहायक होता है, वह विशेष रूप से श्रीकृष्ण ही है। इसी प्रकार, जो जीव समस्त वैदिक सिद्धान्तों को समझने हेतु जिज्ञासु है, वह भी श्रीकृष्ण का अंश है और अतएव वही श्रीकृष्ण है। समस्त वैदिक मन्त्रों में ओम् शब्द, जिसे प्रणव कहते हैं, एक दिव्य ध्वनि-कम्पन है और वह भी श्रीकृष्ण है। और क्योंकि चारों वेदों—साम, यजुः, ऋग् तथा अथर्व—के समस्त सूक्तों में प्रणव या ओंकार अत्यन्त प्रमुख है, अतः उसे श्रीकृष्ण ही समझा जाता है।