अध्याय 9 · 18 / 34
9.18
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥
गतिः—लक्ष्य; भर्ता—पालक; प्रभुः—स्वामी; साक्षी—साक्षी; निवासः—धाम; शरणम्—शरण; सुहृत्—परम घनिष्ठ मित्र; प्रभवः—सृष्टि; प्रलयः—प्रलय; स्थानम्—आधार; निधानम्—विश्रामस्थल; बीजम्—बीज; अव्ययम्—अविनाशी।
मैं लक्ष्य, पालक, स्वामी, साक्षी, धाम, शरण तथा परम प्रिय मित्र हूँ। मैं सृष्टि तथा संहार, समस्त वस्तुओं का आधार, विश्रामस्थल तथा शाश्वत बीज हूँ।
गति का अर्थ है वह गन्तव्य जहाँ हम जाना चाहते हैं। किन्तु परम लक्ष्य श्रीकृष्ण ही हैं, यद्यपि लोग इसे नहीं जानते। जो श्रीकृष्ण को नहीं जानता, वह भ्रमित है, और उसकी तथाकथित प्रगतिशील यात्रा या तो आंशिक है या भ्रममात्र है। ऐसे अनेक लोग हैं जो भिन्न-भिन्न देवताओं को अपना गन्तव्य बनाते हैं, और उन-उन की कठोर विधियों का दृढ़ता से पालन करके चन्द्रलोक, सूर्यलोक, इन्द्रलोक, महर्लोक आदि नामक विभिन्न लोकों को प्राप्त करते हैं। किन्तु ये समस्त लोक, श्रीकृष्ण की सृष्टि होने के कारण, एक साथ श्रीकृष्ण भी हैं और श्रीकृष्ण नहीं भी। वस्तुतः ऐसे लोक, श्रीकृष्ण की ऊर्जा के प्रकटीकरण होने के कारण, श्रीकृष्ण ही हैं, किन्तु वास्तव में वे केवल श्रीकृष्ण की अनुभूति हेतु एक सोपान का कार्य करते हैं। श्रीकृष्ण की विभिन्न ऊर्जाओं के समीप जाना श्रीकृष्ण के परोक्ष रूप से समीप जाना है। मनुष्य को सीधे श्रीकृष्ण के समीप जाना चाहिए, क्योंकि इससे समय तथा ऊर्जा की बचत होगी। उदाहरणार्थ, यदि किसी भवन की छत पर लिफ़्ट की सहायता से जाने की सम्भावना हो, तो मनुष्य सीढ़ियों से पग-पग करके क्यों जाए? सब कुछ श्रीकृष्ण की ऊर्जा पर टिका है; अतः श्रीकृष्ण की शरण के बिना कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं रह सकती। श्रीकृष्ण परम शासक हैं, क्योंकि सब कुछ उन्हीं का है और सब कुछ उन्हीं की ऊर्जा पर अस्तित्वमान है। श्रीकृष्ण, प्रत्येक के हृदय में स्थित होने के कारण, परम साक्षी हैं। जिन निवासों, देशों या लोकों पर हम रहते हैं, वे भी श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्ण शरण के परम लक्ष्य हैं, और अतएव मनुष्य को या तो रक्षा हेतु अथवा अपनी दुःखमय अवस्था के निवारण हेतु श्रीकृष्ण की शरण लेनी चाहिए। और जब भी हमें रक्षा लेनी हो, तब हमें यह जानना चाहिए कि हमारी रक्षा अवश्य ही कोई जीवन्त शक्ति होनी चाहिए। इस प्रकार श्रीकृष्ण परम जीव हैं। चूँकि श्रीकृष्ण हमारी उत्पत्ति के स्रोत, अर्थात् परम पिता हैं, अतएव श्रीकृष्ण से बढ़कर न कोई मित्र हो सकता है, न कोई श्रेष्ठतर हितैषी। श्रीकृष्ण सृष्टि के मूल स्रोत तथा संहार के पश्चात् परम विश्राम हैं। अतएव श्रीकृष्ण समस्त कारणों के शाश्वत कारण हैं।