अध्याय 9 · 19 / 34
9.19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥
तपामि—ताप देता हूँ; अहम्—मैं; अहम्—मैं; वर्षम्—वर्षा; निगृह्णामि—रोकता हूँ; उत्सृजामि—बरसाता हूँ; च—और; अमृतम्—अमरता; च—और; एव—निश्चय ही; मृत्युः—मृत्यु; च—और; सत्—सत्; असत्—असत्; च—और; अहम्—मैं; अर्जुन—हे अर्जुन।
हे अर्जुन! मैं ताप, वर्षा तथा अनावृष्टि का नियन्त्रण करता हूँ। मैं अमरता हूँ, और मैं मूर्तिमान मृत्यु भी हूँ। सत् तथा असत् दोनों मुझमें ही हैं।
श्रीकृष्ण अपनी विभिन्न ऊर्जाओं द्वारा विद्युत् तथा सूर्य के माध्यम से ताप एवं प्रकाश का प्रसार करते हैं। ग्रीष्म ऋतु में श्रीकृष्ण ही आकाश से वर्षा गिरने से रोकते हैं, और तत्पश्चात् वर्षा ऋतु में वे अविराम मूसलाधार वर्षा प्रदान करते हैं। जो ऊर्जा हमारी आयु की अवधि बढ़ाकर हमें धारण करती है, वह श्रीकृष्ण हैं, और अन्त में श्रीकृष्ण ही मृत्यु के रूप में हमसे मिलते हैं। श्रीकृष्ण की इन समस्त भिन्न-भिन्न ऊर्जाओं का विश्लेषण करके मनुष्य यह निश्चय कर सकता है कि श्रीकृष्ण के लिए पदार्थ तथा आत्मा में कोई भेद नहीं है, अथवा, दूसरे शब्दों में, वे पदार्थ तथा आत्मा दोनों ही हैं। कृष्णभावनामृत की उन्नत अवस्था में मनुष्य अतएव ऐसे भेद नहीं करता। वह प्रत्येक वस्तु में केवल श्रीकृष्ण को ही देखता है।
चूँकि श्रीकृष्ण पदार्थ तथा आत्मा दोनों हैं, अतएव समस्त भौतिक प्रकटीकरणों को समेटे हुए विराट विश्वरूप भी श्रीकृष्ण ही है, और वृन्दावन में बंशी बजाते हुए द्विभुज श्यामसुन्दर के रूप में उनकी लीलाएँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की ही लीलाएँ हैं।