हि

अध्याय 9 · 20 / 34

9.20

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥

त्रै-विद्याः—तीनों वेदों के ज्ञाता; माम्—मुझको; सोम-पाः—सोमरस के पान करने वाले; पूत—पवित्र; पापाः—पाप; यज्ञैः—यज्ञों द्वारा; इष्ट्वा—पूजा करके; स्वर्गतिम्—स्वर्ग का मार्ग; प्रार्थयन्ते—प्रार्थना करते हैं; ते—वे; पुण्यम्—पुण्य; आसाद्य—भोगते हुए; सुरेन्द्र—इन्द्र का; लोकम्—लोक; अश्नन्ति—भोगते हैं; दिव्यान्—दिव्य; दिवि—स्वर्ग में; देव-भोगान्—देवताओं के भोग।

जो लोग वेदों का अध्ययन करते हैं तथा सोमरस का पान करते हैं और स्वर्गलोक की कामना करते हैं, वे मेरी परोक्ष रूप से आराधना करते हैं। वे इन्द्र के लोक में जन्म लेते हैं, जहाँ वे दिव्य भोगों का आनन्द लेते हैं।

त्रै-विद्याः शब्द तीनों वेदों—साम, यजुः तथा ऋग्—की ओर संकेत करता है। जिस ब्राह्मण ने इन तीनों वेदों का अध्ययन किया है, वह त्रिवेदी कहलाता है। जो कोई इन तीनों वेदों से व्युत्पन्न ज्ञान में अत्यधिक आसक्त है, वह समाज में सम्मानित होता है। दुर्भाग्यवश, वेदों के ऐसे अनेक महान विद्वान हैं जो उनके अध्ययन के परम तात्पर्य को नहीं जानते। अतएव श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं को त्रिवेदियों के परम लक्ष्य के रूप में घोषित करते हैं। वास्तविक त्रिवेदी श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण लेते हैं और भगवान् को प्रसन्न करने हेतु शुद्ध भक्ति में संलग्न होते हैं। भक्ति का आरम्भ हरे कृष्ण महामन्त्र के जप से होता है और साथ-साथ श्रीकृष्ण को यथार्थ रूप में समझने के प्रयत्न से होता है। दुर्भाग्यवश जो लोग केवल वेदों के औपचारिक विद्यार्थी हैं, वे इन्द्र, चन्द्र आदि विभिन्न देवताओं को यज्ञ अर्पित करने में अधिक रुचि लेते हैं। ऐसे प्रयत्न द्वारा विभिन्न देवताओं के उपासक निश्चय ही प्रकृति के निम्न गुणों के कल्मष से शुद्ध हो जाते हैं और तदद्वारा महर्लोक, जनलोक, तपोलोक आदि नामक उच्चतर लोकों या स्वर्गलोकों में उन्नत होते हैं। उन उच्चतर लोकों में स्थित हो जाने पर मनुष्य अपनी इन्द्रियों को इस लोक की अपेक्षा लाखों गुना अधिक तृप्त कर सकता है।