हि

अध्याय 9 · 22 / 34

9.22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥

अनन्याः—अन्य कोई नहीं; चिन्तयन्तः—एकाग्र होते हुए; माम्—मुझमें; ये—जो; जनाः—व्यक्ति; पर्युपासते—भली-भाँति आराधना करते हैं; तेषाम्—उनकी; नित्य—सदा; अभियुक्तानाम्—भक्ति में स्थिर; योग-क्षेमम्—आवश्यकताएँ; वहामि—वहन करता हूँ; अहम्—मैं।

किन्तु जो मेरे दिव्य रूप का ध्यान करते हुए भक्ति-सहित मेरी आराधना करते हैं—उनके लिए मैं उस वस्तु को वहन करता हूँ जिसका उनमें अभाव है, और जो उनके पास है उसकी रक्षा करता हूँ।

जो कृष्णभावनामृत के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता, वह चौबीसों घण्टे श्रीकृष्ण का ही चिन्तन किए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि वह श्रवण, कीर्तन, स्मरण, प्रार्थना अर्पित करने, आराधना करने, भगवान् के चरणकमलों की सेवा करने, अन्य सेवाएँ अर्पित करने, सख्य-भाव विकसित करने तथा भगवान् को पूर्णतः आत्मसमर्पण करने द्वारा भक्ति में संलग्न रहता है। ऐसी समस्त क्रियाएँ शुभ तथा आध्यात्मिक शक्तियों से परिपूर्ण होती हैं; वस्तुतः वे भक्त को आत्म-साक्षात्कार में पूर्ण बना देती हैं। तब उसकी एकमात्र इच्छा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करना रह जाती है। इसी को योग कहते हैं। भगवान् की कृपा से ऐसा भक्त इस भौतिक जीवन-दशा में कभी नहीं लौटता। क्षेम भगवान् की कृपामयी रक्षा की ओर संकेत करता है। भगवान् भक्त को योग द्वारा कृष्णभावनामृत प्राप्त करने में सहायता करते हैं, और जब वह पूर्णतः कृष्णभावनाभावित हो जाता है, तब भगवान् उसकी रक्षा करते हैं कि वह दुःखमय बद्ध जीवन में पुनः न गिरे।