अध्याय 9 · 23 / 34
9.23
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
ये—जो; अपि—भी; अन्य—अन्य; देवता—देवता; भक्ताः—भक्त; यजन्ते—आराधना करते हैं; श्रद्धया-अन्विताः—श्रद्धा-सहित; ते—वे; अपि—भी; माम्—मुझको; एव—ही; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; यजन्ति—यज्ञ करते हैं; अविधि-पूर्वकम्—गलत रीति से।
हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्य देवताओं को जो कुछ भी अर्पित करता है, वह वास्तव में केवल मेरे ही लिए होता है, किन्तु वह सच्ची समझ के बिना अर्पित किया जाता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं, “जो लोग देवताओं की आराधना में संलग्न हैं, वे अधिक बुद्धिमान नहीं हैं, यद्यपि ऐसी आराधना परोक्ष रूप से मेरी ही होती है।” उदाहरणार्थ, जब कोई मनुष्य वृक्ष की जड़ में जल डाले बिना उसकी पत्तियों तथा शाखाओं पर जल डालता है, तब वह पर्याप्त ज्ञान के बिना अथवा विधि-नियमों का पालन किए बिना ऐसा करता है। इसी प्रकार, शरीर के विभिन्न अंगों की सेवा करने की विधि यह है कि उदर को भोजन पहुँचाया जाए। देवता, यों कहें, परमेश्वर की शासन-व्यवस्था में विभिन्न अधिकारी तथा निदेशक हैं। मनुष्य को शासन द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना होता है, न कि अधिकारियों या निदेशकों द्वारा बनाए गए नियमों का। इसी प्रकार, प्रत्येक को केवल परमेश्वर की ही आराधना अर्पित करनी चाहिए। इससे भगवान् के विभिन्न अधिकारी तथा निदेशक स्वतः ही सन्तुष्ट हो जाएँगे। अधिकारी तथा निदेशक शासन के प्रतिनिधियों के रूप में नियुक्त होते हैं, और अधिकारियों तथा निदेशकों को कोई रिश्वत देना अवैध है। इसी को यहाँ अविधि-पूर्वकम् कहा गया है। दूसरे शब्दों में, श्रीकृष्ण देवताओं की अनावश्यक आराधना का अनुमोदन नहीं करते।