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अध्याय 9 · 24 / 34

9.24

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥

अहम्—मैं; हि—निश्चय ही; सर्व—समस्त; यज्ञानाम्—यज्ञों का; भोक्ता—भोक्ता; च—और; प्रभुः—स्वामी; एव—भी; च—और; न—नहीं; तु—किन्तु; माम्—मुझको; अभिजानन्ति—जानते हैं; तत्त्वेन—वास्तव में; अतः—अतएव; च्यवन्ति—गिर पड़ते हैं; ते—वे।

मैं ही समस्त यज्ञों का एकमात्र भोक्ता तथा एकमात्र लक्ष्य हूँ। जो लोग मेरे यथार्थ दिव्य स्वरूप को नहीं पहचानते, वे गिर पड़ते हैं।

यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वैदिक साहित्य में अनेक प्रकार के यज्ञ-अनुष्ठान अनुशंसित हैं, किन्तु वास्तव में वे सभी परमेश्वर को सन्तुष्ट करने हेतु हैं। यज्ञ का अर्थ है विष्णु। भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मनुष्य को केवल यज्ञ अर्थात् विष्णु को सन्तुष्ट करने हेतु ही कर्म करना चाहिए। मानव सभ्यता का पूर्णता-रूप, जिसे वर्णाश्रम-धर्म कहते हैं, विशेष रूप से विष्णु को सन्तुष्ट करने हेतु है। अतएव श्रीकृष्ण इस श्लोक में कहते हैं, “मैं समस्त यज्ञों का भोक्ता हूँ, क्योंकि मैं परम स्वामी हूँ।” तथापि अल्पबुद्धि व्यक्ति, इस तथ्य को न जानकर, क्षणिक लाभ हेतु देवताओं की आराधना करते हैं। अतएव वे भौतिक अस्तित्व में गिर पड़ते हैं और जीवन के अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त नहीं करते। तथापि, यदि किसी की कोई भौतिक इच्छा पूर्ण करनी हो, तो उसके लिए श्रेयस्कर है कि वह उसकी प्रार्थना परमेश्वर से करे (यद्यपि वह शुद्ध भक्ति नहीं है), और इस प्रकार वह अभीष्ट फल प्राप्त कर लेगा।