अध्याय 9 · 27 / 34
9.27
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
यत्—जो; करोषि—तुम करते हो; यत्—जो कुछ; अश्नासि—तुम खाते हो; यत्—जो कुछ; जुहोषि—तुम अर्पित करते हो; ददासि—तुम दान करते हो; यत्—जो कुछ; यत्—जो कुछ; तपस्यसि—तुम तप करते हो; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; तत्—वह; कुरुष्व—करो; मत्—मुझको; अर्पणम्—अर्पण।
हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित तथा दान करते हो, और जो भी तप करते हो, वह सब मुझे अर्पण के रूप में करना चाहिए।
अतएव प्रत्येक का यह कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को इस प्रकार ढाले कि वह किसी भी परिस्थिति में श्रीकृष्ण को न भूले। प्रत्येक को अपने शरीर तथा आत्मा को एक साथ बनाए रखने हेतु कर्म करना पड़ता है, और श्रीकृष्ण यहाँ अनुशंसा करते हैं कि मनुष्य को उन्हीं के लिए कर्म करना चाहिए। प्रत्येक को जीवित रहने हेतु कुछ खाना ही पड़ता है; अतएव उसे श्रीकृष्ण को अर्पित खाद्य-पदार्थों के अवशेष ही स्वीकार करने चाहिए। किसी भी सभ्य मनुष्य को कुछ धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करने पड़ते हैं; अतएव श्रीकृष्ण अनुशंसा करते हैं, “इसे मेरे लिए करो,” और इसी को अर्चना कहते हैं। प्रत्येक में कुछ दान देने की प्रवृत्ति होती है; श्रीकृष्ण कहते हैं, “इसे मुझे दो,” और इसका अर्थ है कि समस्त संचित अतिरिक्त धन कृष्णभावनामृत आन्दोलन को आगे बढ़ाने में लगाया जाना चाहिए। आजकल लोग ध्यान की विधि की ओर अत्यधिक प्रवृत्त हैं, जो इस युग में व्यावहारिक नहीं है, किन्तु यदि कोई अपनी माला पर हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते हुए चौबीसों घण्टे श्रीकृष्ण का ध्यान करने का अभ्यास करे, तो वह निश्चय ही श्रेष्ठतम योगी है, जैसा कि भगवद्गीता के षष्ठ अध्याय द्वारा प्रमाणित है।