अध्याय 9 · 28 / 34
9.28
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
शुभ—शुभ; अशुभ—अशुभ; फलैः—फलों; एवम्—इस प्रकार; मोक्ष्यसे—मुक्त; कर्म—कर्म; बन्धनैः—बन्धन; सन्न्यास—त्याग के; योग—योग; युक्त-आत्मा—जिसका मन दृढ़तापूर्वक स्थिर है; विमुक्तः—मुक्त; माम्—मुझको; उपैष्यसि—तुम प्राप्त करोगे।
इस प्रकार तुम शुभ तथा अशुभ कर्मों की समस्त प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाओगे, और इस त्याग के सिद्धान्त द्वारा तुम मुक्त होकर मेरे पास आओगे।
जो उच्चतर मार्गदर्शन में कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, वह युक्त कहलाता है। तकनीकी पद है युक्त-वैराग्य। इसे श्रील रूप गोस्वामी आगे इस प्रकार समझाते हैं।
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि जब तक हम इस भौतिक जगत् में हैं, तब तक हमें कर्म करना ही पड़ता है; हम कर्म करना नहीं छोड़ सकते। अतएव यदि कर्म किए जाएँ और उनके फल श्रीकृष्ण को अर्पित कर दिए जाएँ, तो वह युक्त-वैराग्य कहलाता है। वास्तव में त्याग में स्थित होकर ऐसी क्रियाएँ मन के दर्पण को स्वच्छ कर देती हैं, और ज्यों-ज्यों कर्ता आध्यात्मिक अनुभूति में क्रमशः प्रगति करता है, वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति पूर्णतः शरणागत हो जाता है। अतएव अन्त में वह मुक्त हो जाता है, और इस मुक्ति को भी विशिष्ट रूप से बताया गया है। इस मुक्ति द्वारा वह ब्रह्मज्योति के साथ एक नहीं हो जाता, अपितु परमेश्वर के लोक में प्रवेश करता है। यहाँ स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है: माम् उपैष्यसि, “वह मेरे पास आता है,” घर, भगवद्धाम। मुक्ति की पाँच भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हैं, और यहाँ यह विशिष्ट रूप से बताया गया है कि जिस भक्त ने अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में, जैसा कि कहा गया, परमेश्वर के मार्गदर्शन में यहाँ जीवन व्यतीत किया है, वह उस स्थिति तक विकसित हो गया है जहाँ वह इस शरीर को त्यागने के पश्चात् भगवद्धाम लौट सकता है और सीधे परमेश्वर के सान्निध्य में संलग्न हो सकता है।
जिसका भगवान् की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने के अतिरिक्त अन्य कोई स्वार्थ नहीं, वह वास्तव में संन्यासी है। ऐसा व्यक्ति सदा अपने को एक नित्य सेवक मानता है, जो भगवान् की परम इच्छा पर आश्रित है। अतएव वह जो कुछ भी करता है, वह भगवान् के हित के लिए करता है। जो भी कर्म वह करता है, उसे वह भगवान् की सेवा के रूप में करता है। वह वेदों में वर्णित सकाम कर्मों या विहित कर्तव्यों की ओर गम्भीर ध्यान नहीं देता। सामान्य व्यक्तियों के लिए वेदों में वर्णित विहित कर्तव्यों का सम्पादन अनिवार्य है, किन्तु यद्यपि भगवान् की सेवा में पूर्णतः संलग्न शुद्ध भक्त कभी-कभी विहित वैदिक कर्तव्यों के विरुद्ध जाता प्रतीत होता है, वास्तव में ऐसा नहीं है।
अतएव वैष्णव अधिकारियों द्वारा कहा गया है कि अत्यन्त बुद्धिमान व्यक्ति भी शुद्ध भक्त की योजनाओं तथा क्रियाओं को नहीं समझ सकता। ठीक शब्द हैं—वैष्णवेर क्रिया मुद्रा विज्ञे ना बुझया। जो व्यक्ति इस प्रकार सदा भगवान् की सेवा में संलग्न रहता है अथवा सदा यही सोचता तथा योजना बनाता रहता है कि भगवान् की सेवा किस प्रकार की जाए, उसे वर्तमान में तथा भविष्य में पूर्णतः मुक्त मानना चाहिए। उसका घर, भगवद्धाम लौटना सुनिश्चित है। वह समस्त भौतिकतावादी आलोचना से ऊपर है, ठीक जैसे श्रीकृष्ण समस्त आलोचना से ऊपर हैं।