हि

अध्याय 9 · 31 / 34

9.31

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥

क्षिप्रम्—शीघ्र ही; भवति—हो जाता है; धर्म-आत्मा—धर्मात्मा; शाश्वत्-शान्तिम्—स्थायी शान्ति; निगच्छति—प्राप्त करता है; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; प्रतिजानीहि—न्यायपूर्वक घोषित करो; न—कभी नहीं; मे—मेरा; भक्तः—भक्त; प्रणश्यति—नष्ट होता है।

वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति प्राप्त करता है। हे कुन्तीपुत्र! साहसपूर्वक यह घोषित कर दो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

इसे ग़लत न समझा जाए। सातवें अध्याय में भगवान् कहते हैं कि जो दुष्कर्मों में संलग्न रहता है, वह भगवान् का भक्त नहीं बन सकता। जो भगवान् का भक्त नहीं है, उसमें किसी प्रकार का सद्गुण नहीं होता। तब यह प्रश्न शेष रह जाता है कि घृणित कर्मों में संलग्न व्यक्ति—चाहे संयोगवश हो या जानबूझकर—शुद्ध भक्त कैसे हो सकता है? यह प्रश्न न्यायपूर्वक उठाया जा सकता है। जैसा कि सातवें अध्याय में कहा गया है, वे दुष्कर्मी जो कभी भगवान् की भक्ति में नहीं आते, उनमें कोई सद्गुण नहीं होता, जैसा कि श्रीमद्भागवत में वर्णित है। सामान्यतः जो भक्त नवविध भक्ति-कर्मों में संलग्न रहता है, वह हृदय से समस्त भौतिक कल्मष को धोने की प्रक्रिया में लगा रहता है। वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को अपने हृदय में धारण करता है, और समस्त पापमय कल्मष स्वाभाविक रूप से धुल जाते हैं। परम भगवान् का निरन्तर चिन्तन उसे स्वभावतः शुद्ध बना देता है। वेदों के अनुसार एक नियम है कि यदि कोई अपने उच्च पद से नीचे गिर जाए, तो उसे स्वयं को शुद्ध करने हेतु कुछ कर्मकाण्डीय विधियाँ करनी पड़ती हैं। किन्तु यहाँ ऐसी कोई शर्त नहीं है, क्योंकि शुद्धिकरण की प्रक्रिया तो भक्त के हृदय में पहले से ही विद्यमान रहती है, जिसका कारण है उसके द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का निरन्तर स्मरण। अतः हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप अविराम चलते रहना चाहिए। यह भक्त की समस्त आकस्मिक पतनों से रक्षा करेगा। इस प्रकार वह सदैव समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त बना रहेगा।