हि

अध्याय 9 · 4 / 34

9.4

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥

मया—मेरे द्वारा; ततम्—व्याप्त; इदम्—ये समस्त प्रकटीकरण; सर्वम्—समस्त; जगत्—विश्व-प्रकटीकरण; अव्यक्त-मूर्तिना—अव्यक्त रूप से; मत्-स्थानि—मुझमें; सर्व-भूतानि—समस्त जीव; न—नहीं; च—भी; अहम्—मैं; तेषु—उनमें; अवस्थितः—स्थित।

मेरे द्वारा, मेरे अव्यक्त रूप में, यह समस्त ब्रह्माण्ड व्याप्त है। समस्त प्राणी मुझमें हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्थूल भौतिक इन्द्रियों के द्वारा अनुभवगम्य नहीं हैं। कहा गया है कि भगवान् श्रीकृष्ण के नाम, यश, लीला इत्यादि भौतिक इन्द्रियों के द्वारा नहीं समझे जा सकते। वे केवल उसी के समक्ष प्रकट होते हैं जो उचित मार्गदर्शन में शुद्ध भक्ति में संलग्न है। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है, प्रेमाञ्जनच्छुरित…। जिसने भगवान् के प्रति दिव्य प्रेममयी मनोवृत्ति विकसित कर ली है, वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द को अपने भीतर तथा बाहर सदा देख सकता है। अतः सामान्य लोगों के लिए वे दृश्यमान नहीं हैं। यहाँ कहा गया है कि यद्यपि वे सर्वव्यापी हैं, सर्वत्र उपस्थित हैं, तथापि वे भौतिक इन्द्रियों के द्वारा अकल्पनीय हैं। किन्तु वास्तव में, यद्यपि हम उन्हें नहीं देख सकते, तथापि सब कुछ उन्हीं में स्थित है। जैसा कि हमने सातवें अध्याय में विवेचन किया है, सम्पूर्ण भौतिक विश्व-प्रकटीकरण उनकी दो भिन्न ऊर्जाओं—परा आध्यात्मिक ऊर्जा तथा अपरा भौतिक ऊर्जा—का ही संयोग है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश समस्त ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है, उसी प्रकार भगवान् की ऊर्जा समस्त सृष्टि में फैली हुई है, और सब कुछ उसी ऊर्जा में स्थित है।

तथापि मनुष्य को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि चूँकि वे सर्वत्र फैले हुए हैं, अतः उन्होंने अपना व्यक्तिगत अस्तित्व खो दिया है। ऐसे तर्क का खण्डन करने हेतु भगवान् कहते हैं, “मैं सर्वत्र हूँ, और सब कुछ मुझमें है, फिर भी मैं पृथक् हूँ।” उदाहरणार्थ, कोई राजा एक शासन का प्रधान होता है, जो राजा की ऊर्जा का ही प्रकटीकरण है; विभिन्न शासकीय विभाग राजा की ऊर्जाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं, और प्रत्येक विभाग राजा की शक्ति पर आश्रित है। किन्तु फिर भी राजा से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह प्रत्येक विभाग में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हो। यह एक स्थूल उदाहरण है। इसी प्रकार, जो समस्त प्रकटीकरण हम देखते हैं, और जो कुछ भी इस भौतिक जगत् तथा आध्यात्मिक जगत् दोनों में विद्यमान है, वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की ऊर्जा पर आश्रित है। सृष्टि उनकी विभिन्न ऊर्जाओं के विसरण से होती है, और जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, वे अपने व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व, अर्थात् अपनी विभिन्न ऊर्जाओं के विसरण द्वारा, सर्वत्र उपस्थित हैं।