हि

अध्याय 9 · 5 / 34

9.5

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥

न—कभी नहीं; च—भी; मत्-स्थानि—मुझमें स्थित; भूतानि—समस्त सृष्टि; पश्य—देखो; मे—मेरी; योगम् ऐश्वरम्—अचिन्त्य योगशक्ति; भूत-भृत्—समस्त जीवों का पालनकर्ता; न—कभी नहीं; च—भी; भूत-स्थः—विश्व-प्रकटीकरण में; मम—मेरा; आत्मा—स्वरूप; भूत-भावनः—समस्त प्रकटीकरणों का स्रोत है।

और फिर भी जो कुछ सृजित है, वह मुझमें स्थित नहीं है। मेरे योगैश्वर्य को देखो! यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालनकर्ता हूँ, और यद्यपि मैं सर्वत्र हूँ, तथापि मेरा स्वरूप ही सृष्टि का मूल स्रोत है।

भगवान् कहते हैं कि सब कुछ उन्हीं में स्थित है। इसका भ्रामक अर्थ नहीं लगाना चाहिए। भगवान् का इस भौतिक प्रकटीकरण के पालन तथा भरण से प्रत्यक्ष सरोकार नहीं है। कभी-कभी हम एटलस का चित्र देखते हैं जो अपने कन्धों पर पृथ्वी को धारण किए हुए है; इस विशाल पार्थिव लोक को धारण करते हुए वह अत्यन्त थका हुआ प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण के इस सृजित ब्रह्माण्ड को धारण करने के सम्बन्ध में ऐसी कल्पना नहीं करनी चाहिए। वे कहते हैं कि यद्यपि सब कुछ उन्हीं में स्थित है, तथापि वे पृथक् हैं। ग्रह-मण्डल अन्तरिक्ष में तैर रहे हैं, और यह अन्तरिक्ष परमेश्वर की ऊर्जा है। किन्तु वे अन्तरिक्ष से भिन्न हैं। वे भिन्न रूप से स्थित हैं। अतः भगवान् कहते हैं, “यद्यपि वे मेरी अचिन्त्य ऊर्जा पर स्थित हैं, तथापि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में मैं उनसे पृथक् हूँ।” यही भगवान् का अचिन्त्य ऐश्वर्य है।

वैदिक कोश में कहा गया है, “परमेश्वर अपनी ऊर्जा का प्रदर्शन करते हुए अचिन्त्य रूप से अद्भुत लीलाएँ कर रहे हैं। उनका व्यक्तित्व विभिन्न सामर्थ्यवती ऊर्जाओं से परिपूर्ण है, और उनका संकल्प स्वयं वास्तविक तथ्य है। इस प्रकार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझना चाहिए।” हम कुछ करने का विचार कर सकते हैं, किन्तु अनेक बाधाएँ आती हैं, और कभी-कभी अपनी इच्छानुसार करना सम्भव नहीं होता। किन्तु जब श्रीकृष्ण कुछ करना चाहते हैं, तब केवल अपनी इच्छा-मात्र से सब कुछ इतनी पूर्णता से सम्पन्न हो जाता है कि कोई कल्पना नहीं कर सकता कि वह कैसे हो रहा है। भगवान् इस तथ्य की व्याख्या करते हैं: यद्यपि वे समस्त भौतिक प्रकटीकरण के पालनकर्ता तथा भरणकर्ता हैं, तथापि वे इस भौतिक प्रकटीकरण का स्पर्श नहीं करते। केवल उनकी परम इच्छा से सब कुछ सृजित होता है, सब कुछ धारण किया जाता है, सब कुछ पालित होता है, और सब कुछ संहृत होता है। उनके मन तथा उनमें कोई भेद नहीं है (जैसा कि हमारे तथा हमारे वर्तमान भौतिक मन में भेद है), क्योंकि वे परम आत्मा हैं। साथ ही भगवान् प्रत्येक वस्तु में उपस्थित हैं; फिर भी सामान्य व्यक्ति यह नहीं समझ सकता कि वे व्यक्तिगत रूप से भी कैसे उपस्थित हैं। वे इस भौतिक प्रकटीकरण से भिन्न हैं, फिर भी सब कुछ उन्हीं में स्थित है। इसे यहाँ योगम् ऐश्वरम्, अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की योगशक्ति, के रूप में समझाया गया है।