अध्याय 9 · 6 / 34
9.6
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥
यथा—जिस प्रकार; आकाश-स्थितः—आकाश में स्थित; नित्यम्—सदा; वायुः—वायु; सर्वत्र-गः—सर्वत्र बहने वाली; महान्—महान्; तथा—उसी प्रकार; सर्वाणि—समस्त; भूतानि—सृजित प्राणी; मत्-स्थानि—मुझमें स्थित; इति—इस प्रकार; उपधारय—समझने का प्रयत्न करो।
जिस प्रकार सर्वत्र बहने वाली प्रबल वायु सदा आकाशीय अन्तरिक्ष में स्थित रहती है, उसी प्रकार जान लो कि समस्त प्राणी मुझमें स्थित हैं।
सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझना प्रायः अकल्पनीय है कि यह विशाल भौतिक सृष्टि उनमें किस प्रकार स्थित है। किन्तु भगवान् एक ऐसा उदाहरण दे रहे हैं जो हमें समझने में सहायता कर सकता है। आकाश सबसे बड़ा प्रकटीकरण है जिसकी हम कल्पना कर सकते हैं। विश्व-प्रकटीकरण आकाश में स्थित है। आकाश परमाणुओं से लेकर सबसे बड़े ग्रहों, सूर्य तथा चन्द्र तक की गति को अनुमति देता है। यद्यपि व्योम (अथवा वायु अथवा हवा) महान् है, तथापि वह आकाश के भीतर ही स्थित है। आकाश व्योम से परे नहीं है।
इसी प्रकार, समस्त अद्भुत विश्व-प्रकटीकरण ईश्वर की परम इच्छा से विद्यमान हैं, और वे सभी उस परम इच्छा के अधीन हैं। जैसा कि हम सामान्यतया कहते हैं, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इच्छा के बिना घास का एक तिनका भी नहीं हिलता। इस प्रकार सब कुछ उनकी इच्छा के अधीन गतिशील है: उनकी इच्छा से सब कुछ सृजित हो रहा है, सब कुछ पालित हो रहा है, और सब कुछ संहृत हो रहा है। फिर भी वे प्रत्येक वस्तु से पृथक् हैं, जिस प्रकार आकाश वायुमण्डल की क्रियाओं से सदा पृथक् रहता है। उपनिषदों में कहा गया है, “यह परमेश्वर के भय से ही है कि वायु बहती है।” गर्ग उपनिषद् में भी कहा गया है, “परम आदेश से, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की अध्यक्षता में, चन्द्र, सूर्य तथा महान् ग्रह गतिशील हैं।” ब्रह्म-संहिता में भी यही कहा गया है। सूर्य की गति का भी वर्णन है, और कहा गया है कि सूर्य को परमेश्वर के नेत्रों में से एक माना जाता है तथा उसमें ताप एवं प्रकाश का विसरण करने की अपार सामर्थ्य है। फिर भी वह गोविन्द के आदेश तथा परम इच्छा से अपनी निर्धारित कक्षा में गतिशील है। अतः वैदिक साहित्य से हमें यह प्रमाण मिलता है कि यह भौतिक प्रकटीकरण, जो हमें अत्यन्त अद्भुत तथा महान् प्रतीत होता है, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के पूर्ण नियन्त्रण में है। इसकी व्याख्या इस अध्याय के परवर्ती श्लोकों में आगे की जाएगी।